The Bengal Files: A Controversial Movie watch now

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बंगाल फाइल्स: ऐतिहासिक हिंसा और पहचान की विवादास्पद कहानी

नई दिल्ली, 21 सितंबर 2025: सिनेमा कभी-कभी इतिहास की किताबों से ज्यादा जोरदार तरीके से हिला देता है। विवेक अग्निहोत्री की नई फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ ने ऐसा ही तूफान मचा रखा है। ये फिल्म 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली दंगों की भयावहता को सामने लाती है, लेकिन साथ ही ये सवाल भी खड़े कर रही है कि क्या ये सच्चाई का आईना है या राजनीतिक हथियार? फिल्म रिलीज होते ही आलोचकों और दर्शकों के बीच बहस छिड़ गई – एक तरफ इसे हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की अनदेखी को उजागर करने वाली बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे हिंदुत्व की प्रोपगैंडा करार दिया जा रहा है। आइए, इस विवाद की परतें खोलें।

फिल्म की कहानी 1946 के ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स से शुरू होती है। मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान किया था, जो पाकिस्तान की मांग के लिए था। कलकत्ता (अब कोलकाता) की सड़कों पर हिंसा भड़क उठी – चार दिनों में करीब 10,000 लोग मारे गए, ज्यादातर हिंदू। फिर नोआखाली में दंगे फैले, जहां हिंदुओं पर हमले हुए, घर जलाए गए, और महिलाओं पर अत्याचार किए गए। फिल्म में एक क्रिमिनल इन्वेस्टिगेटर की कहानी है, जो मिसिंग पर्सन केस सॉल्व करते हुए 1946 की सच्चाई से टकराता है। दूसरी तरफ, एक बुजुर्ग महिला (पल्लवी जोशी) अपने अनुभव सुनाती है, जो आज के बंगाल की डेमोग्राफिक चिंताओं से जोड़ती है। मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर, दर्शन कुमार और सिमरत कौर जैसे सितारे हैं, जो 1940 के दशक की त्रासदी को जीवंत बनाते हैं।

विवेक अग्निहोत्री की ये ‘फाइल्स ट्रायलॉजी’ का आखिरी हिस्सा है – ताशकंद फाइल्स और कश्मीर फाइल्स के बाद। अग्निहोत्री कहते हैं कि फिल्म इतिहास को दफनाने वालों के खिलाफ है। वो मानते हैं कि डायरेक्ट एक्शन डे को ‘क्लैश’ कहकर छिपा दिया गया, जबकि ये हिंदू जेनोसाइड था। फिल्म में हुसैन शहीद सुहरावर्दी को ‘बंगाल का शेर’ नहीं, बल्कि हिंसा का सूत्रधार दिखाया गया है। गोपाल ‘पाथा’ मुखर्जी जैसे फाइटर्स को हीरो बनाया गया, जो मुस्लिम भीड़ के खिलाफ लड़े। लेकिन यहीं विवाद है। पाथा मुखर्जी के पोते संतानु ने शिकायत दर्ज की कि फिल्म उनके दादा की पहचान तोड़-मरोड़ रही है।

आलोचना की बाढ़ आ गई। ‘द हिंदू’ ने लिखा कि फिल्म कम्युनल पॉइजन का इंजेक्शन है – ग्राफिक हिंसा दिखाकर मुसलमानों को ही दोषी ठहराती है, जबकि गांधी को कमजोर कारिकेचर बनाती है। स्क्रॉल.इन ने कहा कि ये इतिहास का ट्विस्टेड इंटरप्रिटेशन है, जो डेमोग्राफिक चेंज को कांस्पिरेसी बताता है। महाराष्ट्र सिख एसोसिएशन ने आपत्ति जताई कि 1984 के सिख नरसंहार को कमर्शलाइज किया जा रहा। बंगाल में TMC सरकार ने ट्रेलर लॉन्च रोक दिया, जिसे BJP ने सेंसरशिप बताया। एक्टर शशवत चटर्जी ने कहा कि उन्हें टाइटल चेंज (डेल्ही फाइल्स से बंगाल फाइल्स) की खबर ही नहीं थी।

दूसरी तरफ, समर्थक इसे अनदेखी इतिहास का रिस्टोरेशन मानते हैं। स्वराज्य मैगजीन ने कहा कि फिल्म असहज बनाती है, जो जरूरी है – बंगाल के हिंदुओं पर हिंसा को टेक्स्टबुक्स ने ग्लॉस ओवर किया। स्टॉप हिंदू द्वेषा ने लिखा कि ईस्ट पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदू आबादी 25% से घटकर 7% हो गई, 50 मिलियन गायब – हिंसा, फोर्स्ड कन्वर्जन और माइग्रेशन से। फिल्म आज के बंगाल को कश्मीर से जोड़ती है, जहां अल्पसंख्यक एपिजमेंट वोट बैंक बन रहा।

कमर्शियली फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन बहस में कामयाब। ये हमें सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास को सिनेमा कैसे दोहराए? क्या ये सच्चाई उजागर कर रहा है या ध्रुवीकरण बढ़ा रहा? बंगाल चुनाव से पहले ये राजनीतिक हथियार भी लग रही। विवाद के बीच एक बात साफ – हिंसा की यादें दफन न हों, लेकिन नफरत न फैले।

आप क्या सोचते हैं? क्या ‘द बंगाल फाइल्स’ इतिहास सुधार रही या विवाद बढ़ा रही? कमेंट्स में अपनी राय शेयर करें।

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