What about India Law? | Should judges be selected through exams, just like IAS officers?

IAS की तरह जज भी परीक्षा से चुने जाने चाहिए? योग्यता

नई दिल्ली, 21 सितंबर 2025: भारत के न्यायिक सिस्टम में बदलाव की हवा बह रही है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में सुझाव दिया कि जजों का चयन IAS अधिकारियों की तरह प्रतियोगी परीक्षा से होना चाहिए। ये विचार ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस (AIJS) का है, जो युवा टैलेंट को न्यायपालिका में लाने का रास्ता खोलेगा। लेकिन क्या ये सही कदम है? एक तरफ मेरिटोक्रेसी के पैरोकार इसे क्रांतिकारी बताते हैं, तो दूसरी तरफ परंपरा वाले चेताते हैं कि इससे न्याय की नींव हिल सकती है। आइए, इसकी गहराई में उतरें।

वर्तमान में जज कैसे चुने जाते हैं? लोअर ज्यूडिशियरी (सिविल और क्रिमिनल जज) राज्य स्तर की परीक्षाओं से आते हैं, जो स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन आयोजित करती है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज कॉलेजियम सिस्टम से – जहां मौजूदा जज नए नाम सुझाते हैं, और सरकार मंजूरी देती है। ये सिस्टम 1993 के सेकंड जजेस केस से आया, जो न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। लेकिन आलोचना है कि ये अपारदर्शी है – नेपोटिज्म और ‘अंकल जजेस’ की शिकायतें आम हैं। AIJS की बात हो रही है, जो UPSC जैसी परीक्षा से जज चुनकर विविधता लाएगी। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि इससे युवा, मेधावी लोग आएंगे, जो न्यायिक बैकलॉग कम करेंगे।

समर्थकों के तर्क मजबूत हैं। IAS जैसी परीक्षा से मेरिट बेस्ड सिलेक्शन होगा – कोई राजनीतिक दखल नहीं। भारत में 4 करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं, जजों की कमी है। AIJS से विविध जाति-समुदाय के लोग आएंगे, जैसे UPSC में आरक्षण से। ये न्यायपालिका को मजबूत बनाएगा, क्योंकि युवा जज फ्रेश आइडियाज लाएंगे। अमेरिका में भी जज अपॉइंटमेंट्स में मेरिट चेक होती है, हालांकि चुनावी भी। भारत में ये बदलाव बैकलॉग घटाएगा और ट्रांसपेरेंसी बढ़ाएगा।

लेकिन विरोधी कहते हैं कि परंपरा तोड़ना जोखिम भरा है। AIJS से चुने जजों को लोकल भाषा, रीति-रिवाजों की समझ नहीं होगी, जो जस्टिस में बाधा बनेगी। कॉलेजियम न्यायिक इंडिपेंडेंस की गारंटी है – परीक्षा से चुने जज सरकारी दबाव में आ सकते हैं। UPSC vs ज्यूडिशियरी की बहस में कई कहते हैं कि जज का काम कानूनी विशेषज्ञता का है, न कि जनरल एग्जाम का। संविधान के अनुच्छेद 312 में AIJS की प्रावधान है, लेकिन राज्य सहमति जरूरी है। क्या ये फेडरल स्ट्रक्चर को प्रभावित करेगा?

ये बहस मेरिटोक्रेसी vs परंपरा की है। मेरिट से पारदर्शिता आएगी, लेकिन परंपरा से स्थिरता। राष्ट्रपति का सुझाव विचारणीय है, लेकिन लागू करने से पहले प्रोस-कॉन्स वेट करने होंगे। क्या आपको लगता है कि जजों के लिए UPSC जैसी परीक्षा जरूरी है? या कॉलेजियम ही बेहतर? कमेंट्स में अपनी राय शेयर करें।

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