छत्तीसगढ़ में टीचर का क्रूरता: 8 साल की बच्ची को टॉयलेट जाने पर 100 स्क्वॉट्स करने पड़े, चलने में हो गई असमर्थ

छत्तीसगढ़ में टीचर का क्रूरता: 8 साल की बच्ची को टॉयलेट जाने पर 100 स्क्वॉट्स करने पड़े, चलने में हो गई असमर्थ

रायपुर, 21 सितंबर 2025: टीचर्स डे पर हुई एक ऐसी घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है, जो स्कूलों में बच्चों के साथ हो रही क्रूरता की काली सच्चाई बयान करती है। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के प्रतापगढ़ स्थित डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल में एक महिला टीचर ने क्लास 2 की 8 साल की मासूम बच्ची को टॉयलेट जाने के लिए सजा दी – 100 स्क्वॉट्स करने को मजबूर किया। इतनी सजा का नतीजा ये हुआ कि बच्ची के पैरों में गंभीर चोट लग गई, और वो चलने में असमर्थ हो गई। परिवार ने शिकायत की, तो आखिरकार टीचर को नौकरी से निकाल दिया गया, लेकिन ये सवाल अब भी खड़े हैं कि बच्चों को सजा देने का हक किसको है?

बात 5 सितंबर की है, जो टीचर्स डे था। समृद्धि गुप्ता नाम की ये मासूम क्लासरूम से बाहर निकली, टॉयलेट जाने के लिए। रास्ते में टीचर नम्रता गुप्ता ने उसे रोक लिया। बच्ची ने बताया कि वो टॉयलेट जा रही है, लेकिन टीचर गुस्से में आ गईं। पहले तो डंडे से दो बार पैरों पर मारा, फिर क्लास में ले जाकर 100 स्क्वॉट्स करने को कहा। बच्ची ने जैसे-तैसे सजा पूरी की, लेकिन जल्दी ही पैरों में तेज दर्द होने लगा। वो गिर पड़ी, और चल ही नहीं पाई। परिवार ने पहले स्कूल प्रिंसिपल राजीव सिंह को बताया, लेकिन कोई कार्रवाई न हुई। दो दिन बाद, जब हालत बिगड़ी, तो प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाना पड़ा। डॉक्टरों ने मसल डैमेज बताया, और कहा कि रिकवर होने में वक्त लगेगा।

बच्ची की मां ने आंसू भरी आंखों से कहा, “मेरी बेटी इतनी छोटी है, टॉयलेट जैसी बेसिक जरूरत के लिए सजा? ये तो क्रूरता है, पढ़ाई नहीं।” परिवार ने 7 सितंबर को सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) को शिकायत की। डीईओ इंदु तिरकी ने तुरंत जांच टीम भेजी, और दो दिनों में रिपोर्ट आई। सीसीटीवी फुटेज चेक किया गया, जिसमें सजा देते हुए साफ दिखा। नतीजा? टीचर नम्रता गुप्ता को तत्काल बर्खास्त कर दिया गया, और प्रिंसिपल राजीव सिंह को भी लापरवाही के लिए अनिश्चितकालीन छुट्टी पर भेजा गया। डीएवी इंस्टीट्यूशंस के रीजनल ऑफिसर ने ये फैसला लिया। साथ ही, टीचर के खिलाफ आईपीसी की धारा 323 (मारपीट) और 325 (गंभीर चोट) के तहत केस दर्ज हुआ।

ये घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। #EndCorporalPunishmentInSchools ट्रेंड करने लगा, जहां लोग लिख रहे हैं, “टीचर सजा दें, लेकिन बच्चों की जिंदगी न छीनें।” कई पूर्व छात्रों ने अपनी पुरानी कहानियां शेयर कीं, जहां स्कूलों में ऐसी सजाएं आम थीं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भारत में बॉडी पनिशमेंट पर 2009 से ही बैन है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अमल कमजोर है। सूरजपुर जैसे जिले में स्कूलों में स्टाफ की कमी और ट्रेनिंग की कमी से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। डीईओ ने कहा, “हम जांच पूरी करेंगे, और दोषी को सजा मिलेगी। लेकिन स्कूलों में टीचर्स को सेंसिटाइजेशन वर्कशॉप्स की जरूरत है।”

समृद्धि अब हॉस्पिटल में रिकवर कर रही है। परिवार का कहना है कि वो न्याय चाहते हैं, ताकि कोई और बच्चा न झेले। लेकिन ये हादसा हमें सोचने पर मजबूर करता है – स्कूल सुरक्षित जगह होने चाहिए, सजा का अड्डा नहीं। क्या सख्त कानून और टीचर ट्रेनिंग से ये रुकेगा? या पैरेंट्स को और सतर्क रहना पड़ेगा?

आप क्या सोचते हैं? क्या स्कूलों में बॉडी पनिशमेंट पर और सख्ती होनी चाहिए? कमेंट्स में अपनी राय शेयर करें।

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