स्कूल, सपोर्ट का रूलेट: हर साल 10,000 टीचर छोड़ रहे हैं आम पेट केयरर्स का रास्ता

अरे दोस्तों, कल ही एक पुरानी टीचर दोस्त से बात हुई। वो कह रही थीं, “यार, 15 साल क्लासरूम में गुजारने के बाद अब पेट सिटिंग का काम कर रही हूं। सुबह-सुबह कुत्ते को घुमाना, बिल्ली को दुलारना – बस इतना ही, और शाम को घर फ्री!” सुनकर हंसी आई, लेकिन सोचा तो डर लगा। ये कोई एक की कहानी नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब 10,000 टीचर अपनी नौकरी छोड़कर पेट केयर के साधारण कामों की तरफ मुड़ रहे हैं। स्कूल सिस्टम में सपोर्ट की कमी ने तो जैसे रूलेट बना दिया – कभी जीत, कभी हार।

देखिए, टीचिंग का क्या हाल हो गया है। सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक क्लास, फिर होमवर्क चेक करना, पैरेंट्स से मीटिंग, और ऊपर से एक्स्ट्रा क्लासेस। सैलरी? वो तो बस गुजारा। एक सर्वे में 80% टीचरों ने कहा कि वर्कलोड इतना बढ़ गया है कि ब्रेकटाइम में भी चाय पीने का मौका नहीं। महामारी के बाद तो जैसे बाढ़ आ गई – स्टूडेंट्स का बिहेवियर चेंज, क्लास में डिसरप्शन, और मेंटल हेल्थ का बोझ। 44% नए टीचर तो पांच साल में ही भाग खड़े होते हैं। फिर पेट केयर क्यों? क्योंकि वहां फ्लेक्सिबल टाइमिंग है, स्ट्रेस कम, और जोश ज्यादा। एक डॉग वॉकिंग जॉब में घूमते-फिरते पैसे, या पेट शेल्टर में जानवरों से बातें – ये सब टीचिंग की थकान से राहत देता है।

अब सवाल ये कि स्कूलों का क्या होगा? बच्चे तो बिना अच्छे टीचर के कैसे पढ़ेंगे? गवर्नमेंट को सोचना पड़ेगा – सैलरी बढ़ाओ, वर्कलोड कम करो, मेंटल हेल्थ सपोर्ट दो। वरना ये रूलेट चलता रहेगा, और हमारी आने वाली जनरेशन बिना गाइड के रह जाएगी। आप क्या सोचते हैं? कमेंट में बताइए, कोई टीचर फ्रेंड हो तो शेयर करो। चलो, इस पर बात बढ़ाएं।

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