पंडित जवाहरलाल नेहरू की यादों में कांग्रेस: एक समाचार लेख
प्रकाशन तिथि: 31 मई, 2025
भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारत के निर्माण में पंडित जवाहरलाल नेहरू का योगदान अतुलनीय है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसे देश की आजादी की लड़ाई का प्रमुख मंच माना जाता है, नेहरू के नेतृत्व में न केवल स्वतंत्रता हासिल की, बल्कि एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत की नींव भी रखी। उनकी जयंती (14 नवंबर) को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनके बच्चों के प्रति प्रेम और उनके भविष्य के प्रति उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है। इस लेख में, हम नेहरू की यादों को कांग्रेस के दृष्टिकोण से विस्तार से देखेंगे, उनके योगदान, उनकी नीतियों, और कांग्रेस के इतिहास में उनकी भूमिका को उजागर करेंगे।
नेहरू का प्रारंभिक जीवन और कांग्रेस से जुड़ाव
पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर, 1889 को इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) में एक समृद्ध कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता, मोतीलाल नेहरू, एक प्रसिद्ध वकील और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रहे। नेहरू की माता, स्वरूपरानी, एक समर्पित गृहिणी थीं, जिन्होंने जवाहरलाल को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़े रखा। नेहरू ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर निजी शिक्षकों से प्राप्त की और बाद में इंग्लैंड के हैरो स्कूल और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में प्राकृतिक विज्ञान में डिग्री हासिल की। 1912 में भारत लौटने के बाद, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ सक्रिय रूप से जुड़ गए।
1916 में, नेहरू ने एनी बेसेंट की होम रूल लीग में भाग लिया और महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (1920) में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई। 1920 में प्रतापगढ़ में पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान उन पर लाठीचार्ज हुआ, और 1930 के नमक सत्याग्रह में उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख चेहरा बना दिया।
कांग्रेस के अध्यक्ष और स्वतंत्रता संग्राम
नेहरू ने 1929 में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) की मांग को आगे बढ़ाया, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस अधिवेशन में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया, और नेहरू ने कहा, “जब तक एक भी हिंदुस्तानी मर्द, औरत, बच्चा जिंदा है, तब तक यह तिरंगा झुकना नहीं चाहिए।” उन्होंने छह बार कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सेवा की (लाहौर 1929, लखनऊ 1936, फैजपुर 1937, दिल्ली 1951, हैदराबाद 1953, कल्याणी 1954), जिसने उन्हें पार्टी का एक केंद्रीय व्यक्तित्व बनाया।
1931 के कराची अधिवेशन में, नेहरू ने मौलिक अधिकारों और आर्थिक नीति पर प्रस्ताव रखा, जो स्वतंत्र भारत के संविधान की आधारशिला बना। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी गिरफ्तारी और अहमदनगर जेल में बिताए समय ने उनकी प्रतिबद्धता को और मजबूत किया। नेहरू ने कुल नौ बार जेल यात्राएं कीं, और 1935 में अल्मोड़ा जेल में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध ‘आत्मकथा’ लिखी।
स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री
1947 में भारत की आजादी के बाद, नेहरू को कांग्रेस ने देश का पहला प्रधानमंत्री चुना। यद्यपि सरदार वल्लभभाई पटेल और आचार्य कृपलानी को कांग्रेस में अधिक मत मिले थे, महात्मा गांधी के समर्थन ने नेहरू को यह जिम्मेदारी सौंपी। 1947 से 1964 तक, उन्होंने 16 साल 286 दिनों तक प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की, इस दौरान उन्होंने भारत को एक उपनिवेश से एक गणतांत्रिक राष्ट्र में परिवर्तित किया।
नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संसद का सम्मान किया और लंबी बहसों में धैर्यपूर्वक भाग लिया, जो युवा सांसदों के लिए एक उदाहरण था। उनकी नीतियों ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा दिया। 1950 में लागू हुए भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी।
नेहरू की नीतियां और कांग्रेस का दृष्टिकोण
नेहरू की विचारधारा समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थी। उन्होंने औद्योगिकीकरण, शिक्षा, और विज्ञान को प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जैसे संस्थानों की स्थापना हुई, जिनमें पहला आईआईटी 1952 में खड़गपुर में शुरू हुआ। इसके अलावा, सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और पंचायती राज (1959) ने ग्रामीण भारत के विकास को गति दी।
नेहरू ने पंचशील सिद्धांत को प्रतिपादित किया और गुट-निरपेक्ष आंदोलन (NAM) की स्थापना में जोसिप ब्रोज टीटो और गमाल अब्देल नासर के साथ मिलकर काम किया। कोरियाई युद्ध, स्वेज नहर विवाद, और कांगो समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों में उनकी मध्यस्थता ने भारत को वैश्विक मंच पर एक सम्मानित स्थान दिलाया। 1955 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
बच्चों के प्रति प्रेम: चाचा नेहरू
नेहरू को बच्चों से विशेष लगाव था, जिसके कारण उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहा जाता है। उनकी जयंती को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनके बच्चों के प्रति प्रेम और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को दर्शाता है। नेहरू का मानना था कि बच्चे देश का भविष्य हैं, और उन्होंने शिक्षा और बाल कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।
कांग्रेस और नेहरू की विरासत
कांग्रेस के लिए नेहरू केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक दृष्टिकोण थे। उनकी नीतियों ने कांग्रेस को एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में स्थापित किया, जो 1951, 1957, और 1962 के चुनावों में प्रभुत्व बनाए रखने में सफल रही। उनकी धर्मनिरपेक्षता और समावेशी दृष्टिकोण ने कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी बनाया, जो सभी वर्गों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थी।
हालांकि, 1962 के भारत-चीन युद्ध ने उनके अंतिम वर्षों को चुनौतीपूर्ण बनाया, फिर भी वे जनता के बीच लोकप्रिय रहे। उनकी मृत्यु 27 मई, 1964 को हुई, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। कांग्रेस ने उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी, जैसे कि 2024 और 2025 में शांति वन में आयोजित समारोहों में।
निष्कर्ष
पंडित जवाहरलाल नेहरू की यादें कांग्रेस के इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा हैं। उनकी दूरदर्शिता, नेतृत्व, और समर्पण ने न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाई, बल्कि इसे एक आधुनिक, लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भी स्थापित किया। कांग्रेस आज भी उनकी नीतियों और आदर्शों को आगे बढ़ाने का दावा करती है, जो धर्मनिरपेक्षता, समानता, और वैज्ञानिक प्रगति पर आधारित हैं। नेहरू की यादें न केवल कांग्रेस, बल्कि पूरे भारत के लिए एक प्रेरणा हैं, जो हमें एकजुट और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रेरित करती हैं।
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