हल्द्वानी में जनाक्रोश: बच्ची के रेप-मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट के बरी फैसले पर सड़कें गूंजीं
अरे भाई, कल रात ही एक दोस्त का फोन आया, “यार, हल्द्वानी में तो बवाल मच गया है। एक 12 साल की बच्ची का रेप-मर्डर केस, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया, और लोग सड़कों पर उतर आए!” सुनकर दिल बैठ गया। 2012 का वो काला दिन याद आ गया, जब उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक मासूम लड़की को कुछ शख्सों ने न सिर्फ दर्द दिया, बल्कि उसकी जान ले ली। FIR 5 सितंबर को दर्ज हुई थी, लेकिन केस की जांच में इतनी खामियां थीं कि कोर्ट ने सबूतों को कमजोर बताते हुए बरी कर दिया। फैसला 27 अगस्त 2025 को आया, और उसके बाद से शहर में गुस्सा फूट पड़ा।
देखिए, क्या हुआ था। 4 सितंबर 2012 को लड़की लापता हो गई। अगले दिन उसका शव मिला, हालत ऐसी कि कोई भी इंसान सोचकर कांप जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आरोपी पुटाई को डेथ पेनल्टी और दिलीप को लाइफ इम्प्रिजनमेंट दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शॉडी इन्वेस्टिगेशन और फ्लॉड एविडेंस” की वजह से बरी। कोई ठोस प्रूफ नहीं, चेन ऑफ एविडेंस टूटी हुई, और वॉयसेस की कमी। कोर्ट ने साफ कहा, “बिना रीजनेबल डाउट प्रूव के दोषी नहीं ठहरा सकते।” लेकिन परिवार और लोकल कम्युनिटी के लिए ये फैसला जैसे धोखा। बच्ची के माता-पिता ने कहा, “हमारी बेटी की चीखें कौन सुनेगा? न्याय कहां गया?”
सुबह से ही हल्द्वानी की सड़कों पर प्रोटेस्ट शुरू हो गए। महिलाएं, स्टूडेंट्स, NGO वाले – सब स्क्वेयर पर जमा। “जस्टिस फॉर विक्टिम” के बैनर, कैंडल मार्च, और पुलिस से भिड़ने की कोशिश। एक एक्टिविस्ट ने बताया, “ये सिर्फ एक केस नहीं, सिस्टम की नाकामी है। POCSO एक्ट का क्या मतलब अगर ऐसे फैसले आते रहें?” सोशल मीडिया पर भी हंगामा, #JusticeForHaldwani बच्ची ट्रेंड कर रहा। कुछ लोग CBI जांच की मांग कर रहे, तो कुछ रिव्यू पिटीशन की बात। पुलिस ने सिक्योरिटी बढ़ा दी, लेकिन टेंशन बरकरार।
ये देखकर लगता है, हमारे ज्यूडिशियल सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत। इन्वेस्टिगेशन में सुधार, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स – वरना ऐसे केसों में भरोसा कम होता जाएगा। गवर्नमेंट को सोचना पड़ेगा, बच्चों की सेफ्टी पर। आप क्या कहते हो? ये फैसला सही था या गलत? कमेंट में बताओ, अगर कोई स्टोरी हो तो शेयर करो। चलो, इस मुद्दे पर बात बढ़ाएं, लेकिन शांति से।