“दोगले और मुर्ख लोगो से पूछिये” | आजादी” के 5 महीने बाद – गांधी ने 16 जनवरी 1948 को

“दोगले और मुर्ख लोगो से पूछिये”

“तथाकथित आजादी” के 5 महीने बाद – गांधी ने 16 जनवरी 1948 को – कौन कौन सी “सात मांगो” के साथ “आमरण अनशन” किया था।

विभाजन के बाद पाकिस्तान में “सब कुछ बर्बाद” कर चुके विस्थापित हिन्दूओं और सिखों ने दिल्ली की – “खाली पड़ी मस्जिदों में” शरण ली,

तो गांधी ने – 16 जनवरी 1948 को “सात मांगो” के साथ आमरण अनशन कर दिया था।

उन सात मांगों में से – मुख्य चार मांगो के बारे में जान लीजिये,
चार मुख्य मांगें थीं :—
1- महरौली स्थित – “ख्वाजा कुतुबउद्दीन बख्तियार” का सालाना “उर्स” पहले की तरह मनाया जायेगा – सरकार इसकी गारंटी दे,
2 – पाकिस्तान की वायदा खिलाफी के बावजूद उसे 55 करोड़ रुपये दिए जायें,
3 – भारत में – “हर मुसलमान”- की “सुरक्षा” की गारंटी दी जाये,

4 – जब तक खाली पड़ी “मस्जिदों” से -“शरणार्थियों” को बाहर नहीं निकाल दिया जाता तब तक ये “अनशन” जारी रहेगा।

जनवरी का महीना था।
भीषण हाड़ गलाने वाली सर्दी पड़ रही थी और ऊपर से बारिश हो गयी।

ऐसे में इस “लंगोटिये” की जिद के आगे – दो दिन के अंदर – सभी शरणार्थियों को मस्जिदों और मुसलमानों द्वारा खाली किये गये “मकानों” से निकाल कर – सड़क पर फैंक दिया गया।
बहुत से लोगों के पास अपने बच्चों को ढंकने के लिए पतली सी चादर भी नहीं थीं मगर उन – लाचार और दुखी – हिन्दुओं और सिखों की परवाह किसे थी।

कोई भी तार्किक व्यक्ति यही कहता कि – पहले इन “शरणार्थियों” के रहने की कोई “अस्थायी व्यवस्था” कर दी जाये तो इन्हें पंद्रह बीस दिन बाद भी यहां से हटाया जा सकता है।
असहाय शरणार्थी – “बिड़ला भवन” में – जो गान्धी का अड्डा था
“इससे” मदद मांगने गये तो जैसा होना था वही हुआ,
उनका दर्द तक “नहीं” सुना गया।

मजबूरी में वो शरणार्थी यही नारे लगाते हुए सड़कों पर घूमने लगे –

“अनशन” में – “मरता है तो मरने दो”

उसी रात एक आदमी {गोडसे}दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा था जिसका दिल “शरणार्थियों” की ये हालत और “बुढ़ऊ” की ये जिद देख कर फट गया।

उसी को क्या – किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को – गान्धी की – ये बात नागवार गुजरती।

उसे लगा कि -हिन्दुओं की कीमत पर – ये जरूरत से ज्यादा “तुष्टीकरण” अब खत्म होना चाहिए।

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