हेलो दोस्तों, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बी. आर. गवई एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार उनके एक बयान ने धार्मिक और सामाजिक माहौल को गर्मा दिया है। CJI ने हाल ही में एक समारोह में हिंदू आस्था का जिक्र करते हुए कुछ ऐसा कहा, जिसने न्यायपालिका की निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोग अब न्यायिक संवेदनशीलता और धर्मनिरपेक्ष सम्मान की मांग कर रहे हैं। आखिर क्या है पूरा मामला? चलिए, सरल शब्दों में समझते हैं।
पिछले हफ्ते दिल्ली में एक कार्यक्रम में CJI गवई ने कहा, “हिंदू धर्म में संतुलन और सहिष्णुता का संदेश है, जो हमें न्याय के रास्ते पर प्रेरित करता है।” इस बयान को कुछ लोगों ने धार्मिक संदर्भ के तौर पर लिया और इसे न्यायपालिका की धर्मनिरपेक्ष छवि के खिलाफ बताया। सोशल मीडिया पर तुरंत हंगामा मच गया। एक X यूजर ने लिखा, “CJI को धार्मिक बयान देने से बचना चाहिए। यह कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।” वहीं, कुछ लोगों ने इसे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक माना। एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, “CJI ने सिर्फ हिंदू धर्म के मूल्यों की बात की, इसमें गलत क्या है?”
सोचिये!
— ठा. प्रदीप कुमार सिंह (@pradeepthakur_4) September 18, 2025
जहाँ हम न्याय माँगने जाते हैं वो हमारी आस्था को लेकर कितनी क्रूरता से भरा है। मिया लॉर्ड किसी विशेष धर्म पर बोलकर दिखाओ हिन्दुओं की सहनशीलता का नतीजा🧐🧐 pic.twitter.com/dQKhKXINxV
विपक्षी नेताओं ने इस बयान को लेकर सख्त नाराजगी जताई। एक नेता ने कहा, “जब देश में धार्मिक तनाव पहले से मौजूद है, तो CJI का ऐसा बयान गलत संदेश देता है। हमें धर्मनिरपेक्ष कोर्ट चाहिए।” दूसरी ओर, सत्ताधारी दल के समर्थकों ने इसे महज एक प्रतीकात्मक बयान बताया और कहा कि इसे गलत समझा जा रहा है। यह विवाद तब और गहरा गया, जब कुछ लोगों ने इसे CJI के पिछले “झुग्गी” और “विष्णु” वाले बयानों से जोड़ा।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका को हर हाल में धर्म और सियासत से दूर रहना चाहिए। खासकर तब, जब देश में धार्मिक मुद्दों पर पहले से संवेदनशीलता हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अभी कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया, लेकिन यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या जजों को अपने बयानों में और सावधानी बरतनी चाहिए? क्या यह बयान वाकई धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ था, या इसे गलत समझा गया? आपकी राय क्या है? कमेंट में जरूर बताएं।
