अरे यार, आजकल सोशल मीडिया पर तो जैसे आग लगी हुई है। स्क्रॉल करते ही एक पोस्ट, फिर दूसरी – सब सीजेआई बीआर गवई की खजुराहो वाली टिप्पणी पर भड़क रहे हैं। कल दोस्तों के साथ चाय पर बात हो रही थी, एक ने कहा, “भाई, जज साहब ने तो भगवान विष्णु पर ही कमेंट कर दिया!” सुनकर लगा, ये तो बड़ा मुद्दा बन गया। चलिए, बताता हूं क्या बवाल मचा है।
कहानी शुरू होती है 16 सितंबर से। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका आई – मध्य प्रदेश के खजुराहो के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की 7 फुट की टूटी मूर्ति को ठीक करने की। ये यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है, लेकिन मूर्ति सिरहान खो चुकी है, शायद मुगल काल से। याचिकाकर्ता राकेश दालाल ने कहा, पूजा-पाठ रुक गया है, कुछ करो। बेंच पर सीजेआई गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह थे। उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा, “ये आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) का मामला है। अगर आप विष्णु भक्त हैं, तो जाकर उनसे ही कहो कि कुछ करें। प्रार्थना करो, मेडिटेशन करो।” साथ ही जोड़ा, “अभी के लिए शैव मत के खिलाफ तो नहीं ना? खजुराहो में शिव लिंगा बड़ा है, वही पूज लो।” ये सुनते ही कोर्टरूम में हंसी, लेकिन बाहर बवाल!
सोशल मीडिया पर तो तूफान आ गया। लोग कह रहे हैं, ये धार्मिक भावनाओं का अपमान है। एडवोकेट विनीत जिंदल ने सीजेआई को लेटर लिखा – “भगवान विष्णु पर ये टिप्पणी हिंदू सेंटिमेंट्स को ठेस पहुंचाती है, वापस लो।” वीएचपी चीफ अलोक कुमार ने कहा, कोर्ट में बोलने पर संयम रखना चाहिए। कई वकीलों ने ओपन लेटर लिखे, कुछ तो इम्पीचमेंट की डिमांड तक कर दी। एक्स पर #GavaiMustResign ट्रेंड कर रहा है। एक यूजर ने लिखा, “अगर ये किसी और धर्म पर होता, तो सड़कें जल रही होतीं!” आनंद रंगनाथन जैसे लोग वीडियो बना रहे हैं – “सभी धर्मों का सम्मान, लेकिन सिर्फ एक का मजाक?” दूसरी तरफ, कुछ कह रहे हैं कि ये सिर्फ व्यंग्य था, मिसक्वोटेड है। पेटिशनर के वकील संजय नूली ने कहा, “सोशल मीडिया ने तोड़-मरोड़ दिया।”
18 सितंबर को सीजेआई ने सफाई दी। एक हियरिंग में बोले, “मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं। सोशल मीडिया पर तो न्यूटन का लॉ भी फेल हो जाता है – हर एक्शन का रिएक्शन डिस्प्रोपोर्शनल!” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सपोर्ट किया, बोले, “10 साल से जानते हैं, गवई साहब ने सभी धार्मिक जगहें घूमी हैं।” लेकिन बहस थमी नहीं। ओपइंडिया जैसे आउटलेट्स ने इसे “हिंदूफोबिया” कहा, पांच उदाहरण दिए जहां ज्यूडिशरी ने हिंदू मामलों में बायस दिखाया।
ये देखकर लगता है, ज्यूडिशरी और सोशल मीडिया के बीच खाई बढ़ रही है। एक छोटी सी बात पर करोड़ों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। गवर्नमेंट को सोचना चाहिए – क्या कोर्ट को धार्मिक मामलों में ज्यादा सेंसिटिव होना पड़ेगा? या सोशल मीडिया को चेक करना पड़ेगा? वैसे, आप क्या कहते हैं? ये टिप्पणी गलत थी या ओवररिएक्शन? कमेंट्स में बताओ, शेयर करो अगर कोई स्टोरी हो। चलो, बात को आगे बढ़ाएं बिना झगड़े के।
